किसी आत्मकथा की सार्थकता केवल इस बात में नहीं होती कि उसमें लेखक ने अपने जीवन की कितनी घटनाएँ दर्ज की हैं, बल्कि इस बात में होती है कि निजी अनुभव किस सीमा तक अपने समय, समाज और संस्कृति की सामूहिक स्मृति में बदल पाते हैं। कश्मीरा सिंह की कृति ‘साक्षी है समय’ इसी कसौटी पर विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है। यह केवल एक स्त्री की निजी जीवन-कथा नहीं, बल्कि व्यक्ति, परिवार, लोक-संस्कृति, ग्रामीण समाज, इतिहास, प्रशासनिक व्यवस्था और आध्यात्मिक जिज्ञासा को एक सूत्र में बाँधने वाला विस्तृत जीवन-आख्यान है। आत्मकथात्मकता, संस्मरण की मार्मिकता और इतिहास-बोध का ऐसा सम्मिलित रूप इस कृति को साधारण आत्मकथा से अलग करते हुए व्यक्ति, परिवार, समाज, लोक-संस्कृति और इतिहास को एक ही संवेदनात्मक सूत्र में पिरोने वाला जीवंत सांस्कृतिक दस्तावेज बनाता है।

‘साक्षी है समय’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि लेखिका अपने जीवन की स्मृतियों के सहारे अपने परिवार की कई पीढ़ियों, ग्रामीण समाज, स्वतंत्रता-संग्राम, बदलते सामाजिक मूल्यों, प्रशासनिक और न्यायिक विसंगतियों, पुलिस-व्यवस्था, चिकित्सा-संकट, जनजातीय जीवन और अंततः मनुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासा तक पहुँचती हैं। उन्नीस खंडों में विस्तृत यह कृति निजी शोक से आरंभ होकर सामाजिक और ऐतिहासिक यथार्थ की ओर बढ़ती है तथा अंततः जीवन-मृत्यु और परमात्मा के प्रश्नों तक पहुँचती है और इस पूरी यात्रा में ‘समय’ एक अदृश्य सूत्र की तरह उपस्थित रहता है। वह घटनाओं का केवल क्रम नहीं, बल्कि स्मृति और विस्मृति, सुख और दुःख, जन्म और मृत्यु तथा मूल्य-परिवर्तन का साक्षी है।
निजी स्मृति से सामूहिक इतिहास तक
कृति के केंद्र में लेखिका का अपना जीवन है, किंतु इसका वृत्त बहुत व्यापक है जिसमें लेखिका के पारिवारिक जीवन के तीन महत्वपूर्ण व्यक्तित्व हैं- माता देवी क्रांति, पिता रामप्रताप सिंह और पति भूपेन्द्र सिंह। इन तीनों के जीवन-संघर्षों के माध्यम से लेखिका ने तीन अलग-अलग ऐतिहासिक और सामाजिक अनुभवों को सामने रखा है। माता के जीवन में स्वतंत्रता-संग्राम की ग्रामीण चेतना, पिता में संस्कार और देशभक्ति की भूमिका तथा पति के जीवन में ईमानदारी, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा का संसार दिखाई देता है। इस तरह परिवार यहाँ केवल आत्मकथा का निजी परिसर नहीं रह जाता, बल्कि इतिहास और समाज को देखने की एक खिड़की बन जाता है।
‘अहिल्या’ और ‘समय’: निजी पीड़ा के दार्शनिक प्रतीक
कृति के आरंभिक खंडों में पति-वियोग की पीड़ा अत्यंत मार्मिक रूप में सामने आती है। मृत्यु के बाद स्त्री के भीतर उत्पन्न शून्यता, अकेलापन और मानसिक जड़ता को लेखिका ने ‘अहिल्या’ के मिथकीय प्रतीक के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। ‘अहल्या’ यहाँ केवल पौराणिक पात्र नहीं रह जातीं; वह उस स्त्री का प्रतीक बन जाती हैं जो जीवन के किसी असह्य आघात के बाद भीतर से पाषाणवत हो जाती है। प्रिय व्यक्ति की मृत्यु के बाद संसार के अर्थ, भाग्य, ईश्वर, आशीर्वाद और सामाजिक विश्वासों पर प्रश्न उठने लगते हैं। इसी संदर्भ में ‘समय’ कृति का दूसरा केंद्रीय प्रतीक बनकर उभरता है। समय यहाँ केवल घड़ी या कालक्रम नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन, स्मृति, विस्मृति और मृत्यु का मौन साक्षी है। स्मृति पर विस्मृति की धूल जमने का विचार जीवन की नश्वरता की ओर संकेत करता है।
मृत्यु और जन्म के दो छोर
कृति के आरंभिक खंडों की एक विशेष उपलब्धि यह है कि उनमें मृत्यु और जन्म को जीवन के दो चरम छोरों की तरह एक साथ रखा गया है। जहाँ एक ओर पति-वियोग के बाद का अंधकार, शोक और मानसिक जड़ता है, वहीं दूसरी ओर भादो की भयावह रात, बाढ़, मूसलाधार वर्षा और चिकित्सा-सुविधाओं के अभाव के बीच एक स्त्री के प्रसव का संघर्ष है। डॉक्टर या दाई की अनुपस्थिति में स्वयं प्रसव का सामना करती स्त्री और नवजात को अपनी छाती से लगा लेने का प्रसंग स्त्री की अदम्य जिजीविषा का प्रभावशाली उदाहरण बन जाता है। यहाँ मातृत्व किसी भावुक आदर्श तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन को बचाने वाली वास्तविक शक्ति के रूप में सामने आता है। इस प्रकार जन्म और मृत्यु दोनों प्रसंगों में स्त्री जीवन का संघर्ष केंद्रीय हो जाता है।
माँ: व्यक्ति से लोक-संस्कृति तक
माता ‘क्रांति’ से संबंधित संस्मरण कृति के अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सों में हैं। लेखिका अपनी माँ को केवल परिवार की एक सदस्य के रूप में नहीं देखतीं, बल्कि उनके भीतर एक पूरा ग्रामीण संसार उपस्थित पाती हैं। नदी, मिट्टी, झरना, खेत, लोकगीत और आंचलिक भाषाएँ, सब माँ की स्मृति से जुड़ जाते हैं जो माँ को व्यक्ति से आगे बढ़ाकर प्रकृति और लोक-चेतना के प्रतीक में बदल देते हैं। संत तुलसीदास रचित मानस की शिवस्तुति से पंत और प्रसाद की कहानियाँ, विद्यापति के गीत और विश्लेषण से लेकर भिखारी ठाकुर का विदेशिया नाटक (नारी व्यथा की धरोहर) का संदर्भ, इस कथा को साहित्यिक परिदृश्य से जोड़ता है।
मैथिली और अंगिका की सांस्कृतिक स्मृतियाँ
विद्यापति के गीत और लोक-परंपराएँ इस हिस्से को विशेष आंचलिक गरिमा प्रदान करती हैं। साथ ही, लेखिका पुराने ग्रामीण समाज की असमानताओं, सामंती संरचनाओं और रैयतों के शोषण को भी दर्ज करती हैं। इस प्रकार अतीत का चित्रण केवल ‘स्वर्णिम अतीत’ का निर्माण नहीं करता; उसके भीतर मौजूद सामाजिक अंतर्विरोध भी दिखाई देते हैं।
“ऐसा लगता है कि लोक प्रचलित कथाएँ सत्य के क़रीब होती हैं अथवा लोकमानस के विश्वास से जुड़कर सत्य हो जाती हैं” |
बिहार के क्षेत्रीय परिदृश्य का चित्रण
कहानी में सीमांचल के पूर्णिया से अंग क्षेत्र के भागलपुर, तथा मध्य-पूर्वी गंगा क्षेत्र के बेगूसराय से सारण क्षेत्र के छपरा तक की यात्रा/उपस्थिति बिहार के अलग-अलग भूगोलों, बोलियों, लोक-स्मृतियों, सामाजिक संरचनाओं और सांस्कृतिक जीवन को एक व्यापक आख्यान में जोड़ती है। बिहार के उत्तर के मैदानी भूगोल में पूर्णिया और भागलपुर जैसे क्षेत्रों का समावेश भी व्यापक भौगोलिक निरंतरता को रेखांकित करता है।
स्वतंत्रता-संग्राम और ग्रामीण चेतना
कृति में स्वतंत्रता-संग्राम की ग्रामीण पृष्ठभूमि विशेष महत्व ग्रहण करती है। माता ‘क्रांति’, पिता और अन्य पारिवारिक पात्रों के माध्यम से यह बताया गया है कि राष्ट्रीय आंदोलन केवल शहरों या प्रसिद्ध नेताओं तक सीमित नहीं था। ग्रामीण स्त्रियों और सामान्य परिवारों ने भी अपनी क्षमता के अनुसार इसमें भाग लिया। ‘करो या मरो’ की भावना, ब्रिटिश दमन, गिरफ्तारी का भय, घरों में होने वाली राजनीतिक चर्चाएँ और स्वदेशी चेतना उस समय के ग्रामीण मानस की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। विशेष रूप से रक्षाबंधन जैसी पारंपरिक लोक-परंपरा को देशभक्ति और राष्ट्र-चेतना से जोड़ना उल्लेखनीय है। यहाँ त्योहार केवल धार्मिक या पारिवारिक अनुष्ठान नहीं रहता, बल्कि राजनीतिक चेतना का माध्यम बन जाता है।
भूकंप, लोकगीत और अनसुना इतिहास
1934 के बिहार भूकंप का वर्णन कृति को एक अलग ऐतिहासिक आयाम देता है। धरती का फटना, बालू-पानी का निकलना और मलबे में लोगों का दब जाना जैसी घटनाएँ केवल प्राकृतिक आपदा का वर्णन नहीं हैं; वे उस समय के ग्रामीण जीवन की असुरक्षा को भी सामने लाती हैं। इसी के साथ बच्चों के खेल, लोकगीत और पारंपरिक गीतों का संकलन अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसी सामग्री अक्सर औपचारिक इतिहास में दर्ज नहीं हो पाती, लेकिन किसी समाज की वास्तविक सांस्कृतिक स्मृति को समझने में उसका बहुत महत्व होता है। इस दृष्टि से ‘साक्षी है समय’ लोक-इतिहास का भी दस्तावेज बन जाती है।
दुमका: प्रकृति और जनजातीय जीवन
कृति का दुमका संबंधी हिस्सा विशेष रूप से आकर्षक है। लाल-पीली मिट्टी, हरियाली, मयूराक्षी नदी, हिजला पहाड़ और संताली जीवन के वर्णन में लेखिका की प्रकृति-दृष्टि दिखाई देती है। संताली समुदाय की भाषा, कला, जीवन-पद्धति और प्रकृति के साथ उनके संबंध को लेखिका ने आत्मीयता के साथ देखा है। हिजला मेला और स्थानीय लोक-परंपराएँ उस सांस्कृतिक संसार को जीवंत बनाती हैं। इसके साथ शिक्षा-व्यवस्था में आए परिवर्तन और गुरु-शिष्य संबंधों के क्षरण पर लेखिका की चिंता वर्तमान और अतीत के बीच संवाद स्थापित करती है। मोबाइल-केंद्रित वर्तमान बचपन की तुलना प्रकृति के बीच बीते अपने बचपन से करना भी इसी मूल्य-संक्रमण का हिस्सा है।
भूपेन्द्र सिंह: व्यक्ति और व्यवस्था
कृति में पति भूपेन्द्र सिंह का व्यक्तित्व एक अलग कथात्मक धुरी निर्मित करता है। बिहार पुलिस में उनकी नियुक्ति, सैन्य पृष्ठभूमि, अनुशासन, पीटी-परेड और कानून की जानकारी तथा ईमानदारी के कारण उन्हें जिन व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, उनका वर्णन प्रशासनिक व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण पक्ष को सामने लाता है। ईमानदारी की आर्थिक कीमत और नौकरी के भीतर पद, प्रतिष्ठा तथा अधिकार से जुड़े प्रश्न उनके चरित्र को केवल पारिवारिक संस्मरण का विषय नहीं रहने देते। दसवें खंड में उनके साहस, संवेदनशीलता, पुलिस सेवा के अनुभवों और पारिवारिक जीवन के तनावों के साथ मानवीय कमजोरियों का भी उल्लेख मिलता है।
न्याय-व्यवस्था और व्यक्तिगत संघर्ष
भूमि और मकान से जुड़ा लंबा कानूनी विवाद कृति के सबसे पीड़ादायक हिस्सों में है। पुराने मकान, जमीन, मुकदमे, अदालत और वर्षों तक चलने वाले संघर्ष के माध्यम से लेखिका न्याय-व्यवस्था के प्रति अपना गहरा असंतोष व्यक्त करती हैं। इन प्रसंगों को आत्मकथात्मक साक्ष्य के रूप में पढ़ना चाहिए। प्रतिपक्ष, अदालत और संबंधित व्यक्तियों के बारे में लगाए गए आरोप लेखिका के अनुभव और दृष्टिकोण का हिस्सा हैं; उन्हें स्वतंत्र ऐतिहासिक या न्यायिक तथ्य मानने से पहले बाहरी अभिलेखीय प्रमाण अपेक्षित होंगे। ये प्रसंग बताते हैं कि लंबा कानूनी संघर्ष किसी परिवार के मानसिक संसार को किस प्रकार प्रभावित कर सकता है।
गाँव, जातीय-सामाजिक स्मृति, बीमारी, शोक और आध्यात्मिक प्रश्न
साधुपुर गाँव, कृषि-संस्कृति, सामाजिक संरचना, सांप्रदायिक सह-अस्तित्व और वंश-इतिहास के वर्णन से कृति का आंचलिक आयाम और व्यापक हो जाता है। इसके बाद ‘एक आत्मा की परमात्मा के नाम पाती’ जैसा अंश कृति को सांसारिक जीवन से आध्यात्मिक चिंतन की ओर ले जाता है। मनुष्य और ईश्वर का संबंध, मृत्यु का रहस्य, संसार की असमानताएँ और जीवन के अर्थ से जुड़े प्रश्न यहाँ प्रमुख हो जाते हैं। कोविड-19 महामारी, लॉकडाउन, बीमारी, अस्पताल और पति के निधन से जुड़े अंतिम खंड निजी शोक को समकालीन सामाजिक अनुभव से जोड़ देते हैं। बीमारी और उपचार की प्रक्रिया में परिवार की मानसिक तथा आर्थिक विवशता का चित्रण चिकित्सा-व्यवस्था के सामने सामान्य परिवार की असहायता को रेखांकित करता है। यहाँ मृत्यु फिर से कृति के केंद्र में आती है, लेकिन अब वह केवल दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि व्यक्तिगत अनुभव बन चुकी है।
पुस्तक की कई उपलब्धियां हैं परंतु कुछ सीमाएँ भी हैं। कुछ प्रसंगों में कहीं-कहीं भावुकता और आदर्शीकरण अधिक हो जाता है, वहीं कुछ प्रसंगों में घटनाओं का तीव्र संक्रमण कथात्मक प्रवाह को बाधित करता है। साहित्यिक दृष्टि से यह इसकी शक्ति भी है और सीमा भी। इन प्रसंगों में लेखिका की दृष्टि कई बार व्यक्तिगत अनुभव और सामाजिक टिप्पणी के बीच चलती है; इसलिए इन्हें आत्मकथा के साथ-साथ सांस्कृतिक संस्मरण के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। ये सीमाएँ कृति की मूल संवेदनात्मक और सांस्कृतिक उपलब्धि को समाप्त नहीं करतीं।
‘साक्षी है समय’ मूलतः स्मृति को सांस्कृतिक साक्ष्य में बदलने वाली कृति है। कृति का सबसे अर्थपूर्ण पक्ष यही है कि यहाँ समय केवल घटनाओं को बीतते हुए देखने वाला काल नहीं है; वह स्मृति, विस्मृति, परिवर्तन, मृत्यु और सांस्कृतिक निरंतरता का मौन साक्षी है। इस दृष्टि से ‘साक्षी है समय’ को केवल आत्मकथा कहना उसके व्यापक रचनात्मक स्वरूप को सीमित करना होगा। यह आत्मकथा, संस्मरण, लोक-स्मृति, सामाजिक इतिहास और दार्शनिक आत्ममंथन का संगम है, एक ऐसा ‘काव्यात्मक जीवन-आख्यान’, जिसमें निजी पीड़ा सामूहिक स्मृति में बदल जाती है और बीता हुआ समय वर्तमान से संवाद करने लगता है।
कश्मीरा सिंह की इस महत्त्वपूर्ण कृति के लिए उन्हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।
– ज्योति झा
अवार्ड-विनिंग बेस्टसेलिंग लेखिका, कॉलमनिस्ट, TEDx स्पीकर, सीनियर एडिटर और पॉडकास्ट होस्ट
