प्रश्न 1 – ‘श्रापित जलपरी’ लिखने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली, और इस कहानी का विचार आपके मन में कैसे जन्मा ?
डॉ. लक्ष्मी जायसवाल – मेरे लेखन की सबसे बड़ी प्रेरणा मेरी गुरु डॉ. संदेशा भावसार हैं, जो वर्तमान में एम.एम.पी. शाह गर्ल्स कॉलेज में अध्यापन कार्य कर रही हैं। जब मैं एम.ए. द्वितीय वर्ष में उनकी छात्रा थी, तब उन्होंने अपनी पुस्तक ‘कवि एवं आत्मकथाकार बच्चन : मूल्यांकन के निकष पर’ सहित अपनी अन्य कृतियों के बारे में कक्षा में विस्तार से बताया। वे अक्सर अपने लेखन-जीवन, शोध और प्रकाशित पुस्तकों के अनुभव साझा करती थीं। उनकी बातें सुनकर और उनकी प्रकाशित पुस्तकों को देखकर मेरे मन में भी यह इच्छा जागी कि यदि वे अपने विचारों को पुस्तकों के माध्यम से समाज तक पहुँचा सकती हैं, तो मुझे भी अपनी लेखनी के माध्यम से कुछ सार्थक करने का प्रयास करना चाहिए।

इसी प्रेरणा ने मुझे लेखन की दिशा में आगे बढ़ने का साहस दिया। धीरे-धीरे यही प्रयास मेरे पहले हॉरर-सामाजिक उपन्यास ‘श्रापित जलपरी’ के रूप में पाठकों के सामने आया। आज मैं जो भी लिख रही हूँ, उसमें मेरी गुरु का मार्गदर्शन और प्रेरणा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
‘श्रापित जलपरी’ की प्रेरणा मुझे समाज में घटित उन घटनाओं से भी मिली, जो बाहर से सामान्य दिखाई देती हैं, लेकिन उनके भीतर दर्द, अन्याय और कई अनकहे रहस्य छिपे होते हैं। मैं केवल डर पैदा करने वाली कहानी नहीं लिखना चाहती थी, बल्कि ऐसा कथानक रचना चाहती थी जो पाठकों को सोचने पर भी मजबूर करे। इसी सोच से ‘श्रापित जलपरी’ का जन्म हुआ, जहाँ हॉरर और सामाजिक यथार्थ एक साथ चलते हैं।
प्रश्न 2 – आपने हॉरर और मिस्ट्री जैसी विधा के माध्यम से स्त्री उत्पीड़न और सामाजिक अन्याय जैसे गंभीर विषयों को प्रस्तुत करने का निर्णय क्यों लिया ?
डॉ. लक्ष्मी जायसवाल – मेरा मानना है कि साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज का दर्पण भी है। हॉरर और मिस्ट्री पाठकों को कहानी से जोड़े रखते हैं, और उसी के माध्यम से गंभीर सामाजिक मुद्दों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है। ‘श्रापित जलपरी’ में भय केवल वातावरण का हिस्सा है, जबकि उसका वास्तविक उद्देश्य स्त्री उत्पीड़न, अन्याय और सामाजिक संवेदनहीनता पर प्रश्न उठाना है।
प्रश्न 3 – ‘श्रापित जलपरी’ केवल भय की कहानी नहीं, बल्कि समाज से कई प्रश्न भी करती है। आप चाहती हैं कि पाठक इस उपन्यास से क्या संदेश लेकर जाएँ ?
डॉ. लक्ष्मी जायसवाल – मैं चाहती हूँ कि पाठक यह समझें कि सबसे बड़ा भय किसी अलौकिक शक्ति से नहीं, बल्कि समाज में मौजूद अन्याय, चुप्पी और अमानवीयता से है। यदि हम अन्याय के विरुद्ध आवाज़ नहीं उठाते, तो वही अन्याय एक अभिशाप बन जाता है। मेरा संदेश है कि संवेदनशील बनें, सच का साथ दें और हर व्यक्ति के सम्मान तथा अधिकारों की रक्षा करें।
प्रश्न 4 – आपकी पूर्व कृतियाँ शोधपरक रही हैं, जबकि ‘श्रापित जलपरी’ एक फिक्शन उपन्यास है। इन दोनों विधाओं में लेखन का अनुभव किस प्रकार अलग रहा ?
डॉ. लक्ष्मी जायसवाल – शोधपरक लेखन में तथ्यों, प्रमाणों और निष्पक्षता का विशेष ध्यान रखना पड़ता है, जबकि फिक्शन में कल्पना की स्वतंत्रता होती है। फिर भी, मेरी कोशिश रहती है कि कल्पना भी यथार्थ से जुड़ी रहे। ‘श्रापित जलपरी’ लिखते समय मैंने रचनात्मक स्वतंत्रता का आनंद लिया, लेकिन उसके भीतर सामाजिक सच्चाइयों को भी पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत किया।
प्रश्न 5 – आपने अपने गुरु एवं प्रेरणास्रोत डॉ. संदेशा भावसार का विशेष उल्लेख किया है। उनके मार्गदर्शन ने आपके लेखन और साहित्यिक दृष्टिकोण को किस प्रकार आकार दिया ?
डॉ. लक्ष्मी जायसवाल – डॉ. संदेशा भावसार ने मुझे केवल लेखन की तकनीक नहीं सिखाई, बल्कि साहित्य के प्रति गंभीर दृष्टिकोण विकसित करने के लिए भी प्रेरित किया। उन्हें पढ़ते, सुनते और उनके कार्यों को देखते हुए मुझे यह समझ आया कि एक लेखक की जिम्मेदारी केवल लिखना नहीं, बल्कि समाज के प्रति अपनी संवेदनाओं और विचारों को ईमानदारी से अभिव्यक्त करना भी है। उनके मार्गदर्शन ने मुझे निरंतर सीखने, मौलिक सोच विकसित करने और साहित्य के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा दी।

प्रश्न 6 – क्या डॉ. संदेशा भावसार से मिली कोई ऐसी सीख, सलाह या प्रेरणादायक घटना है, जिसने आपके लेखन जीवन में निर्णायक भूमिका निभाई हो ?
डॉ. लक्ष्मी जायसवाल – मेरे लिए सबसे प्रेरणादायक बात यह थी कि उन्होंने अपने लेखन, शोध और प्रकाशित पुस्तकों के अनुभव हम विद्यार्थियों के साथ साझा किए। उन्हें देखकर मुझे विश्वास हुआ कि यदि समर्पण और निरंतर प्रयास किया जाए, तो एक विद्यार्थी भी लेखक बन सकता है। यही प्रेरणा मेरे लेखन जीवन की सबसे महत्वपूर्ण शुरुआत बनी और उन्होंने मुझे पुस्तक लिखने के लिए प्रेरित किया।
प्रश्न 7 – यदि आपको ‘श्रापित जलपरी’ को केवल एक हॉरर उपन्यास नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज़ के रूप में परिभाषित करना हो, तो आप इसे किस तरह प्रस्तुत करेंगी ?
डॉ. लक्ष्मी जायसवाल – मैं ‘श्रापित जलपरी’ को एक ऐसा सामाजिक दस्तावेज़ कहूँगी, जो भय की परतों के भीतर छिपे सामाजिक सच को सामने लाता है। यह उपन्यास केवल रहस्य और रोमांच नहीं, बल्कि उन आवाज़ों का प्रतिनिधित्व करता है जिन्हें समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। इसका उद्देश्य पाठकों को डराना नहीं, बल्कि उन्हें जागरूक और संवेदनशील बनाना है।
प्रश्न 8 – एक युवा लेखिका के रूप में आपकी आगे की साहित्यिक योजनाएँ क्या हैं, और पाठक आपकी आगामी कृतियों में क्या नया देखने की उम्मीद कर सकते हैं ?
डॉ. लक्ष्मी जायसवाल – मेरी कोशिश रहेगी कि मैं सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों पर निरंतर लेखन करूँ। भविष्य में हॉरर, मनोवैज्ञानिक रहस्य, सामाजिक उपन्यास और शोधपरक पुस्तकों पर भी काम करने की योजना है। मैं चाहती हूँ कि मेरी हर नई कृति पाठकों को केवल रोचक अनुभव ही न दे, बल्कि उन्हें कुछ नया सोचने और समाज को सकारात्मक दृष्टि से देखने की प्रेरणा भी दे।
“मैं अपने पाठकों, अपनी गुरु डॉ. संदेशा भावसार जी और अपने परिवार का हृदय से धन्यवाद करती हूँ। आशा है कि मेरी रचनाएँ पाठकों का मनोरंजन करने के साथ-साथ उन्हें सोचने और समाज के प्रति संवेदनशील बनने की प्रेरणा भी देंगी।”
