जिन्दगी रेल की पटरी नहीं है, उसमें संघर्षों के पहाड़ हैं। संघर्षों के बीच बिना विचलित हुए जिनका संकल्पित दृष्टिकोण होता है; वे निरंतर आगे बढ़ते हैं। जीवन की अग्नि परीक्षा में पड़कर ही मनुष्य संतुलित, संयमित होता है। राम वन में गये तो मर्यादा पुरुषोत्तम हुए। त्याग, तपस्या से जीवन निखरता है, सँवरता है, इसलिए जीवन के झंझावातों से चुनौती लेकर आगे बढ़ना ही पुरुषार्थ है। मन को दर्पण कहा गया है। भले बुरे सारे कर्मों का प्रतिबिंब मन पर सहजता से झलकता है। राम से ज्यादा चुनौतिपूर्ण जीवन कृष्ण का है। इसलिए कृष्ण को पूर्ण ब्रह्म कहा जाता है। मनुष्य को परिस्थितियों से अपने को संतुलित करना चाहिए। परिस्थितियों से जूझकर, संघर्ष कर जो अग्रसर होता है वही प्रबुद्ध है। झरना कैसे पत्थरों के सीने पर चलकर अपनी राह बनाता है! पत्थरों को भी गुनगुनाने के लिए बाध्य करता है। संघर्ष से लड़ना यानि शक्तिसंपन्न बनना है। बुद्ध ने बुद्धत्व को प्राप्त करने के लिए महलों का सुख छोड़ा। जिसका जीवन जितना संचर्षमय होता है, वह उतना ही मानवता के शिखर पर पहुँचता है। पार्वती शिवत्व का वरण करने के लिए अपर्णा बन गई। मित्रों, संघर्ष मनुष्य को माँजता है, उनका परिष्कार करता है। साधना, आराधना, तपस्या की अग्नि में पड़कर ही जीवन का तत्वबोध होता है। संघर्ष जीवन की शक्ति है। जीवन की ऊर्जा है। जीवन जीने की कलात्मक दृष्टि है।
लेखिका ने आरसी प्रसाद सिंह जी की कविता ‘जीवन का झरना’ से प्रेरणा लिया है। झरना पहाड़ से निकलता है। मस्ती में गाता है, आनंद में झूमता है, धरती की गोद में गिरता है। फिर मोतियों की माला पहनाकर धरती का अभिनंदन करता है। जहाँ झरना गिरता है वहाँ आनंद ही आनंद, हरियाली ही हरियाली लहलहाती है। दुख:सुख से परे निर्भय होकर मस्ती में झरना गाता गुनगुनाता आगे बढ़ता जाता है। उपर से गिरकर धारा में मिल जाता है। ‘धा’ ‘मतलब मोक्ष और ‘रा’ मतलब प्राप्ति। द्रष्टव्य है झरने का उत्साह, आनंद, आह्लाद -“जीवन एक झरना है/मस्ती इसका पानी है/सुख-दु:ख के दोनों तीरों से /चल रहा राह मनमानी है” कितना विनम्र होकर धारा बहता है! कितनी तारल्यता रहती है! कितना निश्छल होकर गिरता है। कितनी पावनता है! कितनी सहजता, सरलता है! मन की सारी गाँठो को तोड़ उन्मुक्त होकर बहता है। कितनी मिठास है! कितनी विराटता है! सृष्टि में दृष्टि की व्यापकता!
आनंदी के कर्ममय जीवन में मिठास, शीतलता, मोगरे के फूल की सुबास की दिव्य अनुभूति है। उसने व्यक्तिगत मुक्ति को अपना केवल लक्ष्य नहीं बनाया है। समष्टिहित उसके जीवन का पुरुषार्थ है। यह इक्कसीवी सदी के भारत का भव्य प्रकाश है, जिसकी अर्थ व्यवस्था दुनिया की सबसे मजबूत अर्थ व्यवस्थाओं में एक है। अर्थ व्यवस्था की मजबूती हमारे संघर्षों का परिणाम है। आजकल तो एआई की इतनी धूम मची है कि एक बटन पर अंगुलियों के स्पर्श दुनियाँ का सैर करा देता है। एक तरफ भौतिकता, समृद्धि है दूसरी तरफ बेरोजगारों की लंबी फौज खड़ी है। आनंदी ने कभी दायित्वों को बोझ नहीं समझा। कभी-कभी सोचती है कैसे पहाड़ों से शीतल झरना निकल गया? कर्ममय जीवन में जो बिना फल की चिन्ता करते हुए आगे बढ़ता है, जीवन उसके मनमस्तिष्क में मोंगरे के फूल से सँवारती है। जीवन संध्या के मोंगरे के फूल की महक बड़ी सुखद लगती है। आनंदी और केशव का एक दूसरे के प्रति पूर्ण समर्पण भाव है। कहीं अहंकार नहीं, आत्मुग्धता नहीं। जीवन संध्या में बच्चों के परवरिश उनके उत्तम संस्कारों की सुरसरिता अबाध गति से प्रवाहित होती है और माँ बाप के दोनों किनारों की मिट्टी से माथे का तिलक लगाना जीवन की चरम सार्थकता है। जीवन संध्या में बच्चों का सम्मान आदर मिल जाना जीवन का शिवत्व पा लेना है।
ज्योति झा का व्यक्तित्व बहुआयामी है। इंफोसिस और वर्ह्लपुल जैसी कॉरपोरेट से जुड़कर इन्होंने देश-विदेश में ख्याति प्राप्त की है। साथ ही साथ ज्योति झा अध्ययनशील भी हैं। साहित्य में भी इनका उल्लेखनीय योगदान है। इन्होंने अंग्रेजी और हिन्दी साहित्य को अपनी विलक्षण प्रतिभा से श्रीसमृद्ध किया है। TEDx स्पीकर रही ज्योति ने आईआईटी दिल्ली, आईआईटी जम्मू, आईआईएम कलकत्ता और आईआईएम लखनऊ जैसे संस्थानों में वक्ता एवं देश की प्रतिष्ठित लिटरेरी फ़ेस्टिवल्स में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। ज्योति जी की दृष्टि में व्यापकता, सकारात्मकता है। आत्मविश्लेषण और निरंतर जिज्ञासा से साहित्य को एक नई दिशा, नई भंगिमा, नई गरिमा एवं नई अवधारणाओं से निखारने- सँवारने का निरन्तर प्रयास किया है। इस कार्यक्षेत्र में उनके परिवार का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। साहित्यिक पृष्ठभूमि को पुष्ट करने और मनोबल बढ़ाने में लिटेरिया इनसाइट की महती भूमिका है।
“आनंदी “एक नायिका प्रधान रचना है । लेखिका ने इस किताब के माध्यम से मातृशक्ति का अभिनंदन आराधन किया है । आनंदी की कहानी और उसकी पृष्ठभूमि, बिहार के एक पिछड़े गाँव की है। साठ-सत्तर दशक का बिहार जिसमें लड़की का जन्म लेना बड़ा चुनौतीपूर्ण था, ऐसी विकट परिस्थिति में अपने अदम्य साहस, इच्छाशक्ति, उत्कट मनोबल से आनंदी ने अपनी विलक्षण प्रतिभा से अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त किया। “जहाँ चाह वहाँ राह” की नीति पर स्थिर आंनंदी ने सब कुछ पाया अपने दृढ़ संकल्प की ज्योति जलाकर। आनंदी ने गाँव की गरीबी और दरिद्रता से संघर्ष करते हुए शहर में शिक्षा प्राप्त किया और उसी विषम परिस्थिति में उसकी शादी हई। अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति, कुशल नेतृत्व क्षमता ,कर्त्तव्यनिष्ठा के बल पर, गरीबी से जूझकर, उसने अपने परिवार को संपन्नता दिलाया। दृढ़ प्रतिज्ञ होकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उत्कट अभिलाषा को निर्भीकता के साथ अग्रसर होने की चुनौती को अंगीकार किया है।आनंदी ने एक बेटी, बहन, पत्नी, बहू, माँ सभी रूप में आदर्श नारी की मर्यादा की प्रतिमूर्ति में अडिग होकर उसका वरण किया। अपने संपूर्ण संघर्ष में आनंदी ने सारा ध्यान शिक्षा और आत्मनिर्भरता पर केन्द्रित किया, और अपने साथ-साथ अपनी बेटियों को भी एक स्थिर, स्थायी, एवं सार्थक जीवन जीने का मार्ग दिया। अपनी मेधा -प्रतिभा और संयम से पूँजी को व्यवस्थित करते हुए उसने अपनेआप को आत्मनिर्भर बनाया।
ज्योति जी ने आनंदी नायिक प्रधान उपन्यास में एक नारी के नायकत्व को प्रतिष्ठित किया है। जीवन की सार्थकता अहंकार रहित विनम्रता से जीना है। शांति से ही शक्ति की यात्रा निकलती है। विदेह को शांति खेत में मिली। जब विदेह ने सिंहासन छोड़कर प्रजा के लिए चिलचिलाती धूप में कांधे पर हल उठाया। श्रमसाध्य परिश्रम करके हल चलाया उसके पश्चात शांति मिली। जीवन में संघर्ष आते हैं संघर्षो को जो अंगीकार करता है वही नरोत्तम बनता है। ज्योति जी की शिल्पमयता अनूठी है। सहज, सरल शब्दों के माध्यम से कहानी को बहुत सुंदर ढंग से बुना है। आनंदी आदर्श नारी की प्रतिमूर्ति है। गृहस्थी यज्ञ की समिधा मे जलकर उसकी पावन सुंगध की छाँव में ज्ञान साधना की जा सकती है। साधना, तपस्या के पुनीत कर्म में दरिद्रता भी बाधक नहीं बनती। धनु को जितना पीछे खींचा जाएगा निशाना अचूक होगा। मत्स्य बेध के लिए ध्यान केन्द्रित रहना आवश्यक है।
बहुत बहुत शुक्रिया ज्योति जी। आपकी कलम की धार में चैतन्यता का स्फोट है। कलम की धार बनी रहे। मन म्यान है। मनके म्यान में सर्जन की धार अनवरत बनी रहे।
समीक्षक का परिचय
– डॉ सुशीला ओझा
पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, माहेश्वरनाथ महामाया महिला महाविद्यालय, (प.) चंपारण, बिहार। हिंदी एवं भोजपुरी में लेखन, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित, तीन पुस्तकें प्रकाशित एवं चार प्रकाशाधीन, सौ से अधिक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित, अनेक कविताओं एवं कहानियों का यूट्यूब प्रसारण, सेमिनारों एवं वेबिनारों में सक्रिय भागीदारी, अनेक प्रतिष्ठित मंचों द्वारा साक्षात्कार, अनेक साहित्यिक संस्थाओं की आजीवन सदस्य। अनामिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच की संरक्षक। इनकी सुपुत्री डॉ शिप्रा मिश्रा भी शिक्षण एवं स्वतंत्र लेखन में सक्रिय हैं और कई साहित्यिक उपलब्धियों एवं योगदान द्वारा समाज को प्रेरित कर रही हैं। बिहार के लोकप्रिय ऑफिसर आईपीएस विकास वैभव के अभियान लेट्स इंस्पायर बिहार के अंतर्गत लिटरेरी चैप्टर कविता साहित्य अध्याय से दोनों सक्रियता से जुड़ी हैं।

हार्दिक आभार 🙏